सुन्दरकाण्ड पाठ का बिगड़ता स्वरूप — मनोरंजन या भक्ति ?
आज के समय में सुन्दरकाण्ड की बुकिंग के बाद अक्सर एक ही बात सुनने को मिलती है — “पंडित जी, अच्छे से करना, माहौल बन जाना चाहिए, मज़ा आ जाए एकदम ।” लोग बताते हैं कि वे पहले किसी और मंडली को बुलाते थे, लेकिन इस बार कुछ “अलग” और “जोशीला” अनुभव चाहते हैं ।
यह सुनकर सोचने पर मजबूर होना पड़ता है — क्या सुन्दरकाण्ड जैसी गहन, आध्यात्मिक हनुमान-कथा अब केवल एक “इवेंट” बनकर रह गई है ? लोग चौपाइयों के अर्थ और भाव में डूबना नहीं चाहते, बल्कि उन्हें चाहिए तड़कता-भड़कता संगीत और एक उत्सव जैसा माहौल ।
संस्कृति बचाने की बात और हमारा दोहरा रवैया
हम सभी बड़े गर्व से कहते हैं कि अपनी संस्कृति बचानी है, सनातन परंपरा बचानी है — लेकिन सवाल यह है कि जब हम हर पवित्र अनुष्ठान को मनोरंजन में बदल देंगे, तो संस्कृति बचेगी कैसे ? परंपरा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उसके मूल भाव को समझने और जीने से बचती है ।
सुन्दरकाण्ड पाठ कोई सामान्य कथा नहीं है। यह अत्यंत सामर्थ्यशाली, ऊर्जा-प्रदायक, प्रेरणादायक और जीवन-प्रबंधन के गूढ़ सूत्रों से भरा एक अमूल्य आध्यात्मिक साधन है । पर जब हम इसी पाठ को महज़ रस्म या दिखावे की तरह करवाते हैं, तो इसका वास्तविक फल हमें मिल ही नहीं पाता — क्योंकि भाव सुन्दरकाण्ड के प्रति नहीं, सिर्फ ताल और थिरकन पर केंद्रित रहता है ।
अर्थ सहित पाठ ही असली अनुभव है
यहीं पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है — सुन्दरकाण्ड को सही तरीके से अनुभव कैसे किया जाए ? जवाब है — जब हर चौपाई को सिर्फ गाया न जाए, बल्कि उसका सरल भाषा में अर्थ भी समझाया जाए । जब श्रोता को पता चलता है कि कौन सी चौपाई जीवन में किस समस्या का समाधान देती है, संकट में धैर्य कैसे रखा जाए, या बाधाओं से कैसे लड़ा जाए — तब पाठ सिर्फ सुनना नहीं रहता, एक अनुभव बन जाता है । अर्थ सहित संगीतमय सुन्दरकाण्ड पाठ की यही ताकत है — यह भक्ति और ज्ञान दोनों को साथ लेकर चलता है, ताकि श्रोता केवल भावुक न हो बल्कि समझदार भी बने । यही कारण है कि हनुमंत कृपा पात्र – पंकज कटारिया जी द्वारा प्रस्तुत अर्थ सहित संगीतमय सुन्दरकाण्ड पाठ इतना सराहा जाता है — जहाँ भक्ति के साथ ज्ञान भी साथ चलता है ।
जैसा कि उनके एक श्रोता ने अपने अनुभव में बताया :
“Pannkaj Ji ne hamare Griha Pravesh pe bahut hi sundar सुंदरकांड पाठ किया, har chaupai ka अर्थ musically samjhaya aur hamein to bahut hi aanand aaya ।”
— Rajesh Sharma, Sector 21, Faridabad
गुटखा, चाय और शरबत — पाठ के बीच यह विकृति क्यों ?
आश्चर्य तब और बढ़ जाता है जब लोग मुंह में गुटखा भरकर, बीच-बीच में चाय-शरबत की चुस्कियां लेकर पाठ करते हैं । इसमें सबसे बड़े सहयोगी बनते हैं आयोजक स्वयं, जो उत्सव की तरह बीच-बीच में शरबत-चाय परोसते रहते हैं । और उतनी ही ज़िम्मेदार वे मंडलियां भी हैं जो इस विकृति को रोकने के बजाय बढ़ावा देती हैं ।
सुन्दरकाण्ड की मर्यादा — सही पाठ कैसे हो
सुन्दरकाण्ड कराते समय एक आसन पर स्थिर होकर बैठना चाहिए। अत्यंत आवश्यक हो तभी जल लिया जाए, पर पार्टी जैसे माहौल में बीच-बीच में शरबत-चाय लेकर घूमना उचित नहीं । यह एक पवित्र अनुष्ठान है, उत्सव नहीं ।
अतः सभी से विनम्र निवेदन है — अगली बार जब भी सुन्दरकाण्ड पाठ की बुकिंग करें, तो मंडली से यह भी पूछें कि पाठ अर्थ सहित होगा या नहीं, और मर्यादा का पालन होगा या नहीं ।
अपनी संस्कृति और धर्म का उपहास न बनाएं — सुन्दरकाण्ड मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि इसमें स्वयं श्री हनुमान जी का पवित्र चरित्र समाहित है ।
जय सियाराम 🙏
जय श्री सीता राम हनुमान जी महाराज की
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